नरमी जिस चीज़ में भी हो तो उसको सुंदरता देती है | जानने अल्लाह

नरमी जिस चीज़ में भी हो तो उसको सुंदरता देती है

Site Team

जब हम किसी व्यक्ति को पसंद करते हैं, तो अधिकांश हम उनके लिए ऐसे शब्द कहते हैं: फुलाना समझदार है l या फुलाना भारी है l  या फुलाना स्थिर है l  और जब हम किसी व्यक्ति की आलोचना करना चाहते हैं, तो कहते हैं: फुलाना जल्दबाज़ है l फुलाना हल्का है l किन्तु अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-तो कहते हैं: "नम्रता जिस चीज़ में भी हो तो वह उसको सुन्दर बना देती है, और नम्रता जिस चीज़ से निकाली जाती है तो वह उसको भद्दी कर देती है l "  

क्या आप एक टन लोहा को अपनी एक उंगली से हिला सकते हैं?

जी हाँ! यदि आप एक क्रेन को लाएं और धीरे से उसे क्रेन में बांधें और ठीक से उसे बाँध लें फिर उसे उठाएं l जब क्रेन के द्वारा ज़मीन से ऊपर उठ जाए तो आप उस लोहे को अपनी अपनी एक छोटी उंगली से भी हिला सकते हैं l

दो मित्र एक आदमी की दो बेटीयों से शादी का प्रस्ताव रखे, एक बेटी बड़ी थी और दूसरी छोटी थी,  एक मित्र ने दूसरे से कहा: मुझे छोटी बेटी चाहिए, और तुम बड़ी को ले लेना l

दूसरे मित्र ने चीख़ कर कहा: नहीं! तुम बड़ी को लोगे और मैं छोटी को  लूँगा तो पहले मित्र ने कहा: ठीक है तुम छोटी को रखो और मैं उससे छोटी ले लूँगा l 

इस पर दूसरे ने कहा: ठीक है, इस से मैं सहमत हूँ l और उसको पता भी नहीं चला कि वास्तव में उसके मित्र ने अपना फैसला को नहीं बदला उसने केवल अपनी बात के ढंग को नरमी के साथ बदल दिया l

एक हदीस में आया है:"जब अल्लाह किसी घर वालों पर भलाई चाहता है तो उन लोगों के बीच नरमी रखता देता है  और जब अल्लाह किसी घर वालों पर बुराई चाहता है तो उनके बीच से नरमी को छीन लेता है l"    

एक और हदीस में है:" निसंदेह अल्लाह नरमी वाला है और नरमी को पसंद करता है  और वह नरमी पर जो प्रदान करता है जो कठोरता पर  प्रदान नहीं करता है, बल्कि वैसा उससे हट कर किसी और चीज़ पर प्रदान नहीं करता है l 

नरम आदमी तो वही है जो आसान और नम्र है वह सभी का प्रिय होता है , ऐसे व्यक्ति की ओर से दिल को आनंद मिलता है l और लोग उस पर विश्वास करते हैं l

विशेष रूप से यदि नम्रता के साथ साथ नापतोल कर बात करे, और लोगों के साथ सही ढंग से निपटने का ज़बरदस्त कौशल का प्रयोग करे l

न्यायाधीश इमाम अबू-यूसुफ हनफी न्यायशास्त्र के विद्वानों में सबसे प्रसिद्ध विद्वान और इमाम अबू-हनीफा के सबसे प्रमुख छात्र थे l 

अबू-यूसुफ अपने बचपन में बहुत ग़रीब थे l उनके पिता उन्हें इमाम अबू-हनीफा के पाठ में भाग लेने से मना करते थे lऔर बाज़ार में जाकर रोज़ीरोटी कमाने का आदेश देते थे l

इमाम अबू-हनीफा उनकी पढ़ाई केलिए बहुत उत्सुक थे और अनुपस्थिति पर उनको डांटते थे, एक दिन अबू-यूसुफ ने अपने और अपने पिता के बीच की स्तिथि को इमाम अबू-हनीफा के सामने रख दिया l

इस पर इमाम अबू-हनीफा ने उनके पिता को बुलाया, और उनसे पूछा: आपका बेटा प्रतयेक दिन कितना कमाता है?

उन्होंने कहा:दो दिरहम l

इमाम अबू-हनीफा ने कहा: तो ठीक है मैं आपको दो दिरहम दिया करूँगा और उसे पढ़ने दे l

इस प्रकार, अबू-यूसुफ कई वर्षों तक अपने शिक्षक के पास अध्ययन करते रहे l 

जब अबू-यूसुफ जवान होगए और अपने हमजोलियों के बीच विशिष्ट बन गए, तो एक बार वह एक बीमारी से पीड़ित होगए जिसके कारण वह चारपाई पर ही पड़े रहने लगे l इमाम अबू-हनीफा को देखने केलिए आए तो देखा कि उनकी बीमारी बहुत गंभीर है, तो वह उदास हो गए और उनको लगा कि बचने की आशा कम ही है l जब वह वहाँ से निकले तो यह बोलते हुए निकले:ओह अबू-यूसुफ! मैं तो अपने बाद लोगों की सेवा करने की तुम से आशा लगाए हुए था l

यह बोलकर इमाम अबू-हनीफा हाथ मलते और उदासी में अपने अध्ययन बैठक और छात्रों की ओर रवाना होगए l 

कुछ दिनों के बाद अबू-यूसुफ ठीक होगए तो वह स्नान किए, कपड़े पहने और अपने शिक्षक के पाठ में भाग लेने केलिए निकल गए l तो उनके आसपास के लोगों ने उन से पूछा:आप कहाँ जा रहे हैं?

उन्होंने कहा:शैख़ के पाठ में भाग लेने के लिए l

तो लोगों ने उन से कहा:कब तक पाठ लेते रहेंगे? अब बस कीजिए l

क्या आपको पता नहीं चला है कि आपके शैख़ ने आपके बारे में क्या कहा है?

उन्होंने पूछा:क्या कहा?

इस पर उन लोगों ने कहा:उन्होंने तो कहा: कि मैं तो अपने बाद लोगों की सेवा की तुम से आशा लगाए हुए था l मतलब अब आपने इमाम अबू-हनीफा के सभी ज्ञानों को प्राप्त कर लिया है l

और यदि आज शैख़ का निधन हो जाए तो आज से ही आप को उनकी जगह संभालना होगा l

अबू-यूसुफ को ख़ुद पर गौरव महसूस हुआ, जब वह मस्जिद में पहुंचे तो देखा कि इमाम अबू-हनीफा एक कोने में पाठ दे रहे हैं l  तो वह एक दूसरे कोने में बैठे और पाठ और फतवा देना शरू कर दिए l इमाम अबू-हनीफा ने इस नए अध्ययन बैठक को देख कर पूछा:यह किसकी बैठक है? तो लोगों ने कहा: यह अबू-यूसुफ हैं l

उन्होंने पूछा: क्या वह ठीक हो गए l

तो लोगों ने कहा: जी हाँ l

इमाम अबू-हनीफा ने पूछा:तो वह हमारे पाठ में क्यों नहीं आए?

लोगों ने उत्तर दिया: आपकी बात उनको पहुँच गई है l इसलिए

वह ख़ुद लोगों को सिखाने लगे, और अब उनको आप की ज़रूरत नहीं रही l

तो इमाम अबू-हनीफा ने नरमी के साथ इस स्थिति से निपटने के बारे में सोचा l विचार करने के बाद उन्होंने कहा: अबू-यूसुफ बिना छड़ी के नहीं माने गा l

इसके बाद वह अपने पास बैठे एक छात्र की ओर पलटे और बोले: हे फुलाना ज़रा वहाँ बैठे हुए शैख़ के पास जाओ,  यानी अबू-यूसुफ के पास और उनसे कहो: हे शैख़! मेरे पास एक सवाल है, तो वह तुम्हारे सवाल पर ख़ुश होगा और तुम्हारे सवाल के विषय में पूछेगा,  क्योंकि वह तो  बैठे ही हैं इसलिए कि उनसे सवाल पूछा जाए l

तो यह पूछना कि एक आदमी ने एक दर्ज़ी को एक कपड़ा दिया और उसे काट कर सिलने को कहा कुछ दिनों के बाद जब वह अपना परिधान लेने आया तो दर्ज़ी ने साफ़ इनकार कर दिया  और कहा कि उसने उससे कोई कपड़ा लिया ही नहीं इस पर उस आदमी ने पुलिस के पास जाकर शिकायत कर दी,  पुलिस दुकान पर आई और खोज कर कपड़ा निकाल ली l 

अब सवाल यह है: क्या दर्ज़ी कपड़े की सिलाई की मज़दूरी का हक़दार है या इस का हक़दार नहीं है? यदि उसने उत्तर में कहा: हक़दार है तो बोलो कि ग़लत है l और यदि कहे: कि हक़दार नहीं है, तो कह दो कि उत्तर  ग़लत है l

वह छात्र इस जटिल सवाल से ख़ुश हुआ, और तुरंत अबू-यूसुफ के पास गया, और कहा:हे शैख़! एक सवाल है l

अबू-यूसुफ ने कहा: कहिए, आपका सवाल क्या है?

उसने कहा:एक आदमी ने एक दर्ज़ी को कपड़ा दिया अभी सवाल पूरा भी हुआ था कि अबू-यूसुफ ने कहा: हाँ वह मज़दूरी का हक़दार है यदि उसने काम को पूरा किया है l तो प्रश्नकर्ता ने कहा: आपने ग़लत उत्तर  दिया l

अबू-यूसुफ हैरान रह गए l और उन्होंने इस सवाल में ज़रा और गहराई से सोचा, और कहा: नहीं उसे मज़दूरी नहीं मिलेगी l

तो प्रश्नकर्ता ने कहा: यह उत्तर भी ग़लत है l

इस पर अबू-यूसुफ ने उन की ओर देखा और पूछा:अल्लाह केलिए यह तो बताना कि तुम्हें किस ने भेजा है? तो उसने इमाम अबू-हनीफा की ओर इशारा करते हुए कहा: उस शैख़ ने मुझे भेजा है l

इस पर अबू-यूसुफ अपनी बैठक से उठे और सीधा इमाम अबू-हनीफा की बैठक पर पहुंचे और बोले: हे शैख़! एक सवाल है तो इमाम अबू-हनीफा उनकी ओर ध्यान नहीं दिए और अनजान मारे l

तो फिर अबू-यूसुफ आए और उनके सामने अपने घुटनों पर अदब से बैठ गए l

और पूरे सम्मान के साथ कहा:हे शैख़ !एक सवाल है l

उन्होंने कहा:आपका सवाल क्या है ?

अबू-यूसुफ ने कहा:आपको पता है कि सवाल क्या है?

तो इमाम अबू-हनीफा ने कहा: वही दर्ज़ी और परिधान वाला सवाल? अबू-यूसुफ ने कहा: जी हाँ l 

तो इमाम अबू-हनीफा ने कहा:जाओ उत्तर दो, क्या तुम शैख़ नहीं हो? तो उन्होंने कहा: नहीं l शैख़ तो आप ही हैं l  

तो इमाम अबू-हनीफा ने कहा:

पहले देखेंगे कि दर्ज़ी ने कपड़े को कितना छोटा किया है l यदि आदमी की साइज़ के अनुसार काटा है तो इसका मतलब है कि उसने पूरी तरह से अपना काम निभाया फिर बाद में उसे इनकार करने की बात सूझी इसलिए यही समझा जाएगा कि उसने वास्तव में आदमी केलिए ही काम किया था इस बिना पर वह मज़दूरी का हक़दार है l  और यदि उसने अपनी साइज़ की कटिंग की है तो इसका मतलब यही है कि उसने ख़ुद अपने लिए काम किया इसलिए वह मज़दूरी का अधिकारी नहीं है l

इस पर अबू-यूसुफ ने इमाम अबू-हनीफा के माथे को चूम लिया, और इमाम अबू-हनीफा के निधन तक उनका छात्र बने रहे, जब इमाम अबू-हनीफा का निधन हुआ तो अबू-यूसुफ लोगों को सिखाने केलिए उनकी जगह पर बैठ गए l

नरमी और धीरे से समस्याओं को निपटाना कितना सुंदर है !

यदि दोनों विवाहित जोड़े एक दूसरे के साथ और इसी तरह माता पिता, प्रबंधक और शिक्षक सब के सब नरमी से चलें तो अधिकांश समस्याएं और विवाद समाप्त होजाए l

हमको सदा ड्राइविंग में, शिक्षण में और लेनदेन में कोमल रहना चाहिए l  यह होसकता है कि कभी किसी व्यक्ति को कठोरता भी अपनाने की ज़रूरत पड़े l  सलाह देने में भी, और सलाह में भी बुद्धिमानी यही है कि जिस चीज़ की जो जगह है वहीँ रखी जाए l अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- का ग़ुस्सा यदि होता भी था तो केवल धर्मिक विषयों के उल्लंघन पर l  अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-कभी अपने लिए नाराज़ नहीं हुए, वह केवल अल्लाह के पवित्र आदेशों में से किसी आदेश के उल्लंघन पर क्रोधित होते थे l

एक बार उमर-बिन-ख़त्ताब -अल्लाह उनसे ख़ुश रहे- एक यहूदी व्यक्ति से मिले l तो उस यहूदी व्यक्ति ने उन्हें अपने ग्रंथ "टोरा" की कुछ बातें बताया तो उनको वह बातें अच्छी लगीं, इस पर उन्होंने उसे लिख कर देने को कहा: इस के बाद हज़रत उमर उस लिखित को लेकर अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के पास पहुंचे, और उनको पढ़ कर सुनाए,  हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को लगा कि उमर अपने पास की लिखित से ख़ुश हैं और यदि पिछले धर्मों से लेने का दरवाज़ा खोल दिया जाए तो फिर वह बातें क़ुरआन के साथ मिश्रित हो जाए गी और लोग उलझन में पड़ जाएँगे l और फिर उमर ऐसा क्यों कर रहे हैं? हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से अनुमति लिए बिना लिख रहे हैं और लिखवा रहे हैं l तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-क्रोधित हुए और कहा: हे इब्ने-ख़त्ताब ! क्या तुमको उसमें कुछ उलझन है? जिसका अर्थ है क्या तुमको मेरे धर्मशास्त्र में कुछ संदेह है?

उसके बाद उन्होंने कहा: उसकी क़सम जिसके हाथ मैं मेरी जान है, मैं तो इसे उज्ज्वल और साफसुथरा लेकर आया, किसी चीज़ के बारे में उनसे मत पूछो कहीं ऐसा न हो कि वे किसी सच्चाई की ख़बर दें और आप लोग झुटला दें या किसी झूठी बात की ख़बर दें और आप लोग उसे मान लें उसकी क़सम जिसके हाथ मैं मेरी जान है यदि हज़रत मूसा(इस दुनिया में) जिंदा होते तो उनके सामने भी मेरी बात मानने के सिवाय  और कोई चारा नहीं रहता l  

जी हाँ, हम तो नरमी नरमी ही कहेंगे किन्तु कभी कभी कठोरता और क्रोध की भी ज़रूरत पड़ती है l

ग़ुस्से और गर्म होने के उदाहरणों में से एक उदाहरण यह है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपने ईशदौत्य के प्रारंभिक समय में कअबा के पास आते थे और क़ुरैश वहीँ अपनी बैठकों में बैठे होते थे किन्तु हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- नमाज़ पढ़ते थे और उनकी ओर ध्यान नहीं देते थे, वे उनको तरह तरह के दुख पहुंचाते थे फिर भी वह सह जाते थे l

एक दिन क़ुरैश के महान लोग कअबा के पास इकट्ठे हुए, और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के विषय में बात करने लगे और कहने लगे:इस आदमी की ओर से हमको बहुत दुख सहना पड़ रहा है, ऐसा दुख तो हम आज तक देखे ही नहीं l इसने हमारे विचारों को मूर्ख बनाया हमारे पूर्वजों का अपमान किया हमारे धर्म की निंदा की l हमारी एकता को तितरबितर किया, हमारे देवताओं का अपमान किया l इसके कारण हम बहुत बड़ी समस्या में घिर गए, वे एक दूसरे के साथ अभी यही चर्चा कर रहे थे कि इतने में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-वहाँ पहुँच गए, और चल कर कअबा के एक कोने तक पहुंचे और कअबा को चूमे, इस के बाद उनलोगों के सामने से गुज़र कर कअबा का तवाफ़(चक्कर)किए तो उन लोगों ने बातों बातों में उनपर कुछ ताना मारा तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के शुभ चेहरे का रंग बदल गया, किन्तु फिर भी वह उनके साथ नरमी का बर्ताव किए और चुप रहे बल्कि आगे गुज़र गए l  जब वह दूसरी बार उनके पास से गुज़रे तो उनलोगों ने फिर उनपर फब्तियां कसी l तो फिर उनके शुभ चेहरे का रंग बदल गया किन्तु चुप रहे और तवाफ़ करते हुए आगे गुज़र गए l जब तीसरी बार वहाँ से गुज़रे तो वे फिर उनका मज़ाक उड़ाए l उन्होंने महसूस किया कि ऐसे लोगों के साथ नरमी काम नहीं आएगी इसलिए वह उनके पास रुके और उनको संबोधित करते हुए कहा: हे क़ुरैश के लोगो! कान खोल कर सुन लो: उसकी क़सम जिसके हाथ में मेरी आत्मा है तुम लोग मौत के घाट उतारे जाओगे और उनके पास ठहरे l जब उन लोगों ने यह धमकी सुनी "मौत के घाट उतारे जाओगे"और वह तो अत्यंत सच्चे और विश्वसनीय हैं तो वे कूद पड़े और फिर उन में से प्रत्येक व्यक्ति ऐसा चुपचाप हुआ कि जैसे उनके सिरों पर पक्षी बैठी हैं l यहाँ तक कि उनके बीच का कठोर से कठोर आदमी भी उनके साथ नरमी से बात करने लगा l और वे कहने लगे:"जाइए जाइए हे अबुल-क़ासिम सीधा जाइए आप तो नादानी में पड़ने वाले नहीं l"   

यह सुन कर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- वहाँ से गुज़र गए l

जी हाँ: एक कवि का कहना है: (यदि कहा जाए कि सहो तो कह दो सहने का भी एक अवसर होता है l  और अनुचित अवसर पर मर्द का सहना मूर्खता माना जाता है l) 

हालांकि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- की जीवन को बारीकी से अध्ययन करने वाला जानता है कि वह अधिकांश अवसरों पर बल्कि सदा नरमी को ही अपनाते थे l

किन्तु सावधान! नरमी का मतलब कमज़ोरी और कायरता नहीं है l

नम्रता का एक उदाहरण यह भी है कि बद्र की लड़ाई के कई महीने बाद, हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के दामाद हज़रत ज़ैनब के पति अबुल-आस ने हज़रत ज़ैनब को मदीना में उनके पिता के पास भेजने का इरादा किया तो अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने ज़ैद-बिन-हारिसा और अनसार के एक आदमी को मक्का भेजा और उन्होंने उन दोनों को कहा: तुम दोनों मक्का के नज़दीक मदीना को जाने वाली सड़क पर "याअजह" नामक स्थान पर रहो और जब ज़ैनब तुम्हारे पास से गुज़रे तो उनके साथ चलो और उसे मेरे पास लाकर पहुंचा दो l वे दोनों रवाना होगए, अबुल-आस ने हज़रत ज़ैनब को तैयार होने केलिए कहा तो वह अपना सामान जमाने लगी जब वह अपना सामान रही थी तो अबू-सुफ़यान की पत्नी हिन्द बिनति-उतबा उनसे मिली l

उनसे कहा:हे मुहम्मद की बेटी! तुम मुझे क्यों नहीं बता रही हो कि तुम अपने पिता से मिलने की योजना बना चुकी हो?

इस पर हज़रत ज़ैनब बोली: ऐसा कुछ मेरा इरादा नहीं है l उनको डर था कि हिन्द उनके ख़िलाफ कोई साज़िश न रच ले l

उसने कहा: मेरी बहन! यदि तुम जाना चाहती हो तो मुझे बोलो और बताओ यदि तुम्हारी यात्रा केलिए किसी चीज़ की ज़रूरत हो l या तुम्हारे पिता के पास पहुँचने केलिए कुछ पैसे की ज़रूरत हो मैं देती हूँ शर्माने की कोई बात नहीं है l हम दोनों महिलाओं के बीच अलग रिश्ते हैं पुरूषों के बीच के रिश्ते की तरह नहीं है l

हज़रत ज़ैनब कहती हैं :अल्लाह की क़सम मुझे लगा कि वह ज़रूर कोई न कोई साज़िश की योजना दिल में रखती है, इसलिए मुझे डर लगा और मैंने अपनी योजना को उससे छिपा ली l

जब हज़रत ज़ैनब अपना सामान पैक कर लीं तो उनके पति को डर लगा कि कहीं क़ुरैश को उनकी रवानगी की ख़बर न हो जाए इसी कारण अबुल-आस ने अपने भाई किनाना-बिन-रबीअ को एक ऊंट पर उनके साथ जाने केलिए कहा, वह ऊंट पर बैठ गईं और किनाना ने अपना धनुष और तरकश संभाला l

और दिन के उजाले में ही उनको साथ लेकर रवाना हुआ, वह हौदज(ऊंट पर की पालकी) में बैठी थीं l 

लोगों ने उनको देख लिया, और क़ुरैश के कुछ लोग इस विषय में एक दूसरे के साथ बातचीत करने लगे: मुहम्मद की बेटी कैसे जाएगी? जबकि उसने बद्र की लड़ाई में हमारे साथ ऐसा ऐसा बर्ताव किया l वे उनकी तलाश में निकले और ज़ी-तुवा नामक स्थान पर उनको पकड़ लिया l

उनमें से सब से पहले पहुंचने वला व्यक्ति हुबार-बिन-अस्वद था उसने उनको अपने भाले से भयभीत किया था जब वह हौदज में बैठी थीं l

यह भी कहा गया है कि वह गर्भवती थी और उसके डराने के कारण उनका पेट गिर गया l इतने में दूसरे अधर्मी भी दौड़ा-दौड़ी करते उनके पास पहुँच गए, और उन सभों के साथ हथियार थे जबकि उनके साथ अकेला उनका देवर किनाना था, जब उसने यह देखा तो ऊंट को बैठाय  और अपने तरकश को खोला और तीरों को अपने सामने जमा कर रखा और कहा: अल्लाह की क़सम जो जो भी मेरे नज़दीक आने की कोशिश करेगा तो मैं उसे तीर मारूंगा और वह एक अच्छा धनुषधारी था l

यह सुन कर उसके चारों ओर से लोग पीछे हट गए और डगमगा गए, और दूर से उसे ताकने लगे न तो वह आगे बढ़ सकता था और न ही वे उसके नज़दीक हो सकते थे l

होते होते यह बात अबू-सुफ़यान को पहुँच गई कि ज़ैनब अपने पिता के पास जाने केलिए रवाना हो चुकी है, तो वह क़ुरैश के महान पुरूषों के एक समूह के साथ वहां पहुँच गया  जब उन लोगों ने देखा कि किनाना तीर धनुष लेकर तैयार बैठा है और लोग भी उनके साथ लड़ने केलिए तैयार हैं तो अबू-सुफ़यान ने चिल्ला कर कहा:हे मनुष्य! अपना धनुष दूर रखो हम तुम से बात करना चाहते हैं l

इस पर किनाना ने अपना धनुष रख दिया l तो अबू-सुफ़यान नज़दीक आया और पास ठेहर कर कहा: तुमने ठीक नहीं किया तुम दिन के उजाले में हमारे सामने इस औरत को साथ लेकर बाहर निकल रहे हो l और तुमको तो पता है कि बद्र की लड़ाई में हम कैसे कैसे दुख से दो चार हुए और मुहम्मद के कारण हम पर कैसी तबाही आई l हमारे महान पुरूषों को जान से मारा गया हमारी महिलाएं विधवा हुईं l जब लोग देखेंगे, और यहाँ की जनजातियों को पता चलेगा कि तुम दिन के उजाले में और हमारे सामने से उनकी बेटी को लेकर रवाना हुए हो तो वे यही समझेंगे कि हम कुछ काम के नहीं रहे बल्कि हम फुसफुसे और ढीले हो चुके हैं l

 

मैं क़सम खाता हूँ कि हम को इसे इसके पिता से रोकने में कोई लाभ नहीं है, और न हमको इस से कोई बदला लेना है, इसलिए अभी तो तुम इस महिला के साथ वापस आ जाओ  और जब आवाज़ शांत हो जाएगी और लोग कहेंगे कि हमने इन्हें वापस कर लिया तो फिर तुम इसे चुपके से रात में लेकर निकल जाना और उनके पिता के पास पहुँचा देना l जब किनाना ने उसकी बात सुनी तो वह संतुष्ट होगए और उनको लेकर वापस मक्का लौट गए l

इस के बाद मक्का में कुछ रात रुके रहे, जब तक लोगों की आवाज़

शांत हो गई तो फिर रातोंरात उनको लेकर निकल गए, और उन्हें ज़ैद-बिन-हारिसा और उसके साथी के हिवाले कर दिए l फिर वे दोनों उन्हें रातोंरात हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के पास पहुंचा दिए l 

तो देखा आपने कि अबू-सुफ़यान ने कैसी नरमी दिखाई! और किनाना के ग़ुस्सा को कैसे ठंडा कर दिया!  बल्कि वह एक खूनी लड़ाई को रोकने में कैसे सफल रहे! इस तरह उन्होंने हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- की बेटी को भी मारधाड़ से बचा लिया l जबकि अबू-सुफ़यान अभी काफिर ही थे l

तो फिर मुसलमानों को कैसा होना चाहिए?

एक ईशवाणी

नम्रता जिस चीज़ में भी हो तो वह उसको सुन्दर बना देती है, और नम्रता जिस चीज़ से निकाली जाती है तो वह उसको भद्दी कर देती है l

 

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