प्रथम स्तम्भ: 'ला इलाहा इल्लल्लाह और 'मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह की गवाही | जानने अल्लाह

प्रथम स्तम्भ: 'ला इलाहा इल्लल्लाह और 'मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह की गवाही

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'ला इलाहा इल्लल्लाह' (अल्लाह  तआला के अतिरिक्त कोर्इ सच्चा पूज्य नहीं) और 'मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह' (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के संदेश्वाहक हैं) की गवाही:

यह गवाही मनुष्य के इस्लाम में प्रवेष करने का द्वार और कुन्जी है, वह किसी अन्य गवाही या किसी अन्य कहे जाने वाले शब्द के समान नहीं है,  कदापि नहीं,  बलिक इस धर्म के अन्दर उसका एक महान और गहरा अर्थ है,  यही कारण है कि जो व्यक्ति उसे अपने मुख से कह ले और उसके अर्थ को भली-भांति जानता पहचानता हो,  तो उसका प्रतिफल यह है कि कि़यामत के दिन अल्लाह तआला उसे स्वर्ग में दाखिल करेगा। इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस विषय में फरमाते हैं :

;;من شهد أن لا إله إلا الله وحده لا شريك له، وأن محمدا عبده ورسوله، وأن عيسى عبد الله ورسوله، وكلمته ألقاها إلى مريم وروح منه، والجنة حق، والنار حق، أدخله الجنة على ما كان من العمل-

رواه البخاري ومسلم       

जिसने इस बात की गवाही दी कि अल्लाह के अतिरिक्त कोर्इ अन्य पूजनीय नहीं,  वह अकेला है उसका कोर्इ साझी नहीं,  और यह गवाही दे कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के बन्दे और उसके संदेश्वाहक हैं,  और र्इसा अल्लाह के बन्दे (भक्त) और उसके संदेश्वाहक,  तथा उसके कलिमा हैं जिसे मरियम की ओर अल्लाह तआला ने डाल दिया था और उसकी ओर से रूह हैं, और यह कि जन्नत सत्य है और नरक सत्य है, तो ऐसे व्यक्ति को अल्लाह तआला स्वर्ग में प्रवेष दिलाएगा चाहे उसका कर्म कुछ भी हो।“ (बुखारी व मुस्लिम)

            'ला इलाहा इल्लल्लाह' की गवाही का अर्थ यह है कि   और धरती में अकेले अल्लाह के अतिरिक्त कोर्इ अन्य वास्तविक पूज्य नहीं,  वही सच्चा पूज्य है,  और अल्लाह के अतिरिक्त जिसकी भी मनुष्य पूजा करते हैं चाहे उसकी गुणवत्ता कुछ भी हो; वह झूठा और असत्य है।

            'मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह' (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अल्लाह के संदेश्वाहक होने) की गवाही देने का अर्थ यह है कि आप यह ज्ञान और विश्वास (आस्था) रखें कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम संदेश्वाहक हैं जिन्हें अल्लाह तआला ने समस्त मानव और जिन्नात की ओर संदेश्वाहक बनाकर भेजा है, और यह कि वह एक उपासक हैं उपासना के पात्र नहीं हैं (अर्थात उनकी उपासना नहीं की जाएगी) और वह एक संदेश्वाहक हैं उन्हें झुठलाया नहीं जाएगा,  बलिक उनका आज्ञापालन और अनुसरण किया जाएगा,  जिसने उनका आज्ञापालन किया वह स्वर्ग में प्रवेष करेगा,  और जिसने उनकी अवहेलना की वह नरक में जाएगा, पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं :

;;ما من رجل يهودي أو نصراني يسمع بي ، ثم لا يؤمن بالذي جئت به إلا دخل النار

जो भी यहूदी या र्इसार्इ मेरे बारे में सुने,  फिर मेरी लार्इ हुर्इ शरीअत पर र्इमान न लाए, वह नरक में प्रवेष करेगा।

            इसी प्रकार आप यह भी ज्ञान और विश्वास रखें कि शरीअत के क़ानून और आदेश तथा निषेध को,  चाहे उसका संबंध इबादतों से हो, शासन व्यवस्था से हो,  या हलाल और हराम से हो,  या आर्थिक,  या समाजिक या व्यवहारिक जीवन से हो या इनके अतिरिक्त किसी अन्य मैदान से हो,  केवल इस रसूले करीम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मार्ग से ही लिया जा सकता है;  इसलिए कि अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ही अपने रब्ब (पालनहार) की ओर से उसकी शरीअत के प्रसारक व प्रचारक हैं,   अत: किसी मुसलमान के लिए वैध (जायज़) नहीं है कि वह पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रास्ते के अतिरिक्त किसी अन्य रास्ते से आए हुए किसी क़ानून या आदेश या मनाही को स्वीकार करे।

 

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