विश्वास का संकट

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आज की दुनिया में बुराई का अनुपात अच्छाई के मुक़ाबले में लगातार बढ़ रहा है और समाज में विश्वास का संकट पैदा हो रहा है।

बाप ने अपने बच्चे से कहा, ‘‘झूठ मत बोलो।’’ फिर अगर कोई मिलने आता है, तो ख़ुद कहता है कि कह दो, ‘‘घर पर नहीं हैं।’’ शिक्षक कहता है, ‘‘ईमानदार बनो।’’ मगर ख़ुद क्लास नहीं लेता। नेता कहता है, ‘‘अपने देश के लिए कु़रबानी दो।’’ और वह ख़ुद देश के हितों को अपने हित पर कु़रबान कर रहा है। इन परिस्थितियों में नई पीढ़ी के सामने कोई ‘आदर्श प्रतिरूप’ (Role Model) या ‘आदर्श लक्ष्य’ नहीं है। नतीजा यह होता है कि वह स्वार्थ तथा भोग-विलास और मनोरंजन (Entertainment and Fun) को ही अपना आदर्श बना लेती है। कथनी और करनी का यह विरोधाभास विश्वास के संकट (Trust Crisis) का कारण बन गया है। लेकिन एकेश्वरवाद ही एक ऐसी विचारधारा है जो इस बीमारी को ख़त्म कर सकती है, क्योंकि एकेश्वरवाद का माननेवाला जानता है कि अल्लाह उससे कहता है—

‘‘वह बात क्यों कहते हो, जो करते नहीं।’’ (क़ुरआन, 61:3)

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