अल्लाह को गाली देना कुफ्र है, भले ही कुफ्र का इरादा न हो | जानने अल्लाह

अल्लाह को गाली देना कुफ्र है, भले ही कुफ्र का इरादा न हो

अब्दुल अज़ीज़ बिन मरज़ूक़ अत्तरीफ़ी

अल्लाह तआला को गाली देना कुफ्र है इसमें कोर्इ मतभेद नहीं है, तथा अवाम की इस लापरवाही का कोर्इ मान्य नहीं है कि उनका मक़सद कुफ्र का नहीं था, और गाली पर आधारित उनकी बात अल्लाह के हक़ में बुरार्इ का इरादा किए बिना जारी हो गर्इ है।

यह उज़्र पेश करना उज़्र वाले की अज्ञानता का प्रतीक है ! इस उज़्र को स्वीकार करने की बात जह्म बिन सफवान और कट्टरपंथी मुर्जिया के अलावा कोर्इ नहीं कहता है, जिनका कहना यह है कि : र्इमान दिल की जानकारी और पुष्टि का नाम है।

इसका कारण इस बात की जानकारी का न होना है कि र्इमान :

कथनी और करनी दोनों का नाम है ; अर्थात : ईमान ज़ुबान और दिल के कथन, तथा दिल और अंगों का कार्य को सम्मिलित है।

कट्टरपंथी मुर्जिया का मानना है कि ज़ाहिरी अमल र्इमान को साबित नहीं करता है। इस आधार पर वह, दिल के इरादे को देखे बिना, र्इमान को नहीं नकारेगा।

जबकि वास्तकिता यह है कि र्इमान ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) व बातिन (प्रोक्ष) दोनों का नाम है, और उन दोनों में से हर एक दूसरे के साथ मिलकार र्इमान को साबित (प्रमाणित) करता है, और उन दोनों में से किसी एक के न पाये जाने से पूरा र्इमान ही नहीं पाया जाता है।

जिस तरह कि काफिर यदि कुफ्र का इरादा और क़सद करे तो काफिर हो जाता है ; भले ही उसने अपनी ज़ुबान से उसे न कहा हो, या अपने अंगों से उसे न किया हो। उसी तरह वह कुफ्र के कहने की वजह से भी काफिर हो जाता है ; भले ही उसने अपने दिल से कुफ्र की नीयत न की हो और अपने अंगों से उसे न किया हो। तथा इसी तरह कुफ्र का करने वाला भी काफिर हो जाता है, भले ही उसने अपने दिल से कुफ्र का इरादा न किया हो, और अपनी ज़ुबान से उसे न कहा हो।

अगर मनुष्य के अंग कोर्इ हराम (निषिद्ध) काम करेंगे, तो उस पर उनकी पकड़ होगी, और दिलों का मामला अल्लाह के हवाले है। और हर वह व्यक्ति जिस पर - उसके ज़ाहिरी कुफ्र के प्रकट होने की वजह से - कुफ्र का हुक्म लगाया जाता है वह बातिन (प्रोक्ष) में अल्लाह के पास (भी) काफिर नहीं होता है ; अतः बातिन (दिल) के मामले अल्लाह सर्वशक्तिमान के हवाले हैं, और ज़ाहिरी चीज़ों पर दुनिया के अंदर बंदे की पकड़ होगी।

अल्लाह तआला ने उस व्यक्ति पर कुफ्र का हुक्म लगाया है जिसने उसका, उसकी किताब (क़ुर्आन) का और उसके पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का मज़ाक उड़ाया, और उसके इस उज़्र व बहाने को स्वीकार नहीं किया कि उसने गंभीरता का इरादा नहीं किया था ; जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है :

यदि आप उन से पूछेंगे तो वे साफ कह देंगे कि हम तो यूँ ही आपस में हँस बोल रहे थे। आप कह दीजिए, क्या तुम अल्लाह, उसकी आयतों और उसके रसूल का मज़ाक़ उड़ाते थे ? अब बहाने न बनाओ, नि:सन्देह तुम र्इमान के बाद (फिर) काफिर हो गए।

(सूरतुत् तौबा : 65 - 66)

बुद्धि इस बात का तर्क देती है कि लोगों की, उनसे प्रकट होनेवाली चीज़ों पर पकड़ की जायेगी, चुनाँचे किसी पर व्यभिचार के आरोप को स्वीकार नहीं किया जायेगा, इसी तरह बादशाह अपनी बुरार्इ और धिक्कार व अपमान को स्वीकार नहीं करेगा, चाहे लोग लाख बहाना करें कि उनका ऐसा इरादा नहीं था ! चुनांचे अल्लाह तआला ने बिना सबूत के व्यभिचार का आरोप लगानेवाले पर, आरोप का दण्ड : अस्सी कोड़ा लगाने का आदेश दिया है, और आरोप लगाने वाले का यह बहाना क़बूल नहीं किया जायेगा कि उसका मक़सद हँसी और खेल का था।

इसी तरह बादशाह की हैबत (प्रताप) समाप्त हो जायेगी यदि वह लोगों को अपनी इज़्ज़त के साथ हँसी मज़ाक करने की छूट दे दे ; इसीलिए आप देखते हैं कि वह लोगों को सज़ा देता है और उन्हें दंडित करता है, चाहे उनमें कोर्इ मज़ाक के तौर पर ऐसा करने वाला हो या गंगीभरता के साथ।

तथा इस बारे में शरीयत के व्यापक नुसूस (प्रमाण) पाए जाते हैं कि मनुष्य की, उसके उस अपराध और अत्याचार पर पकड़ की जायेगी जिसकी शरीअत और बुद्धि में स्पष्ट रूप से प्रमाणित पद व महानता की जानकारी में उसने लापरवाही से काम लिया है, और इस संबंध में उसका बहाना क़बूल नहीं किया जायेगा।

सहीह हदीस में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा :

अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''बंदा अल्लाह के क्रोध की कोर्इ ऐसी बात कह देता है जिसे कोर्इ महत्व नहीं देता, परंतु उसके कारण वह सत्तर साल नरक में गिर जाता है।

‘सहीह बुखारी’’ (हदीस संख्या : 6478), और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2988) ने इसे संक्षेप में उल्लेख किया है।)

यहाँ अल्लाह तआला ने उसके लिए अज़ाब को अनिवार्य कर दिया और उसे माज़ूर (क्षम्य) नहीं समझा, जबकि उसने अपनी बात पर ध्यान नहीं दिया था ! अर्थात अपने शब्द के मूल्य और अपनी बात के माप को सामने नहीं रखा, क्योंकि वह अपनी बात पर विचार करने में लापरवाह था, यदि वह उसमें सोच विचार करता और थोड़ा भी चिंतन करता तो उसके लिए उसके शब्द की मलिनता और उसके बात की बुरार्इ स्पष्ट हो जाती।

तथा बिलाल बिन हारिस रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में आया है, वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आप ने फरमाया :

तुम में से कोर्इ आदमी अल्लाह के क्रोध की एक बात कहता है, जिसके उस स्तर तक पहुँचने का उसे गुमान नहीं होता जहाँ वह पहुँच गर्इ है, तो इसकी वजह से अल्लाह तआला उसके ऊपर अपने क्रोध को उस दिन तक के लिए लिख देता है जिस दिन वह उससे मुलाक़ात करेगा।

''मुसनद अहमद'' (3/469) हदीस संख्या (15852), ''सहीह इब्ने हिब्बान'' (280).

अतः इंसान का यह बहाना करना कि अल्लाह को गाली देना और उस पर लानत करना, बिना निन्दा व निरादर या अपमान का इरादा किए हुए उसकी ज़ुबान पर आ जाता है : ऐसा उज़्र व बहाना है जिसे इबलीस इंसान को समझाता है ; ताकि उसे उसके कुफ्र पर बनाये रखे और उसे अपने पालनहार के हक़ में अपने ऊपर अत्याचार और अवहेलना पर जमाये रखे। चुनाँचे शैतान इंसान को कुफ्र पर नहीं उकसाता है मगर उसके लिए कमज़ोर अक़ली और शरर्इ संदेह पैदा करके उसे उस पर आश्वस्त कर देता है, हालाँकि वे सही समझ के मानक पर नहीं टिक पाते।

इंसान पर इबलीस के संदेहों, छल कपट, और चालों में से : यह भी है कि वह इंसान की नेकियों को सामने करके उसकी दृष्टि में कुफ्र और पाप को तुच्छ और हल्का बना देता है, जिसकी वजह से पापी इंसान के दिल में अवज्ञा की तकलीफ और पाप का पश्चाताप (अफसोस) समाप्त हो जाता है; जैसे कि अवाम में से अल्लाह को गाली देनेवाले को यह समझाना  कि वह शहादतैन (ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह) का इक़रार करता है, और माता पिता के साथ अच्छा व्यवहार करता है ! और हो सकता है कि उसने नमाज़ भी पढ़ी हो!

इसी तरह के संदेहों और छल के द्वारा मक्का में अरब अनेकेश्वरवादी भी पथभ्रष्ट हुए, उन्हों ने अल्लाह के साथ साझी ठहराया, और उसे छोड़कर मूर्तियों की पूजा की, और अपने दिलों में हाजियों को पानी पिलाने, मस्जिदे हराम को आबाद करने, और काबा को कपड़ा पहनाने की बातें रखीं, लेकिन यह सब अल्लाह के पास उन्हें कोर्इ लाभ नहीं पहुँचाया, क्योंकि उनका अल्लाह के साथ उसके अलावा को साझी ठहराना उसका सम्मान करने के विरूद्ध है, तो वे बैतुल हराम का सम्मान करते हैं जबकि बैतुल हराम के मालिक (पालनहार) के साथ कुफ्र करते हैं ! हालांकि बैतुल हराम का सम्मान उसके मालिक (पालनहार) की वजह से की जाती है, पालनहार का सम्मान उसके घर की वजह से नहीं किया जाता है।

अल्लाह तआला ने फरमाया

क्या तुम ने हाजियों को पानी पिला देना, और मस्जिदे हराम की सेवा करना उस के बराबर कर दिया है जो अल्लाह पर और क़ियामत के दिन पर र्इमान लाये, और अल्लाह के रास्ते में जिहाद किया, ये अल्लाह के निकट बराबर नहीं, और अल्लाह तआला ज़ालिमों (अत्याचारियों) को रास्ता नहीं दिखाता है।

सूरतुत्तौबा : 19

और अधिकतर इंसान का अल्लाह पर र्इमान एक दावा होता है, क्योंकि वह उसके अलावा के विपरीत होता है,

अल्लाह तआला ने फरमाया

और लोगों में से कुछ कहते हैं कि हम अल्लाह पर और आखिरत के दिन पर र्इमान लाये हैं, हालांकि वास्तव में वे र्इमान वाले नहीं हैं।’’ .

सूरतुल बक़रा : 8

अत: अल्लाह का सम्मान करने और शहादतैन का इक़रार करने का दावा, अल्लाह सर्वशक्तिमान को बुरा भला कहने और उसका मज़ाक उड़ाने के साथ शुद्ध नहीं हो सकता।


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